कैसे आकाश में सुराख नहीं हो सकता – लुईHindi

कैसे आकाश में सुराख़ नहीं हो सकता मित्रो दुष्यंत कुमार का जन्म उत्तर प्रदेश में बिजनौर जनपद की तहसील नजीबाबाद के ग्राम राजपुर नवादा में हुवा था। दोस्तों जिस समय दुष्यंत कुमार ने साहित्य की दुनिया में अपना कदम रखे उस समय भोपाल के दो प्रगतिशील शायरों ताज भोपाली तथा कैफ भोपाली का गजलों की दुनिया पर राज था। लेकिन फिर भी सिर्फ ४२ वर्ष के जीवन में दुष्यंत कुमार ने अपार ख्याति अर्जित की. दोस्तों आज हम आपको दुष्यंत कुमार की कविताये और गजले सुनाने जा रहे है। dushyant kumar poem

कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता

Dushyant Kumar Poem

कैसे आकाश में सुराख़ नहीं हो सकता

एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो

दुष्यंत कुमार

जिंदगी जब आजाब होती है आशिकी कामयाब होती है

दुष्यंत कुमार

ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दोहरा हुवा होगा

मैं सज्दे में नहीं था आपको धोखा हुवा होगा

दुष्यंत कुमार

यँहा तक आते-आते सुख जाती है नदियाँ

मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुवा होगा

दुष्यंत कुमार

ये लोग होमो-हवन में यकींन रखते है

चलो यंहा से चलो हाथ कही जल न जाये

दुष्यंत कुमार

कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता

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वो आदमी नहीं मुकम्मल बयान है

माथे पे उसके चोट का गहरा निशान है

दुष्यंत कुमार

तुम्हारे पॉव के निचे कोई जमींन नहीं

कमाल ये है की तुम्हे फिर भी यकींन नहीं

दुष्यंत कुमार

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं

मेरी कोशिश है की ये सूरत बदलनी चाहिए

दुष्यंत कुमार

मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हु

वो गजल आपको सुनाता हु

दुष्यंत कुमार

लहू लुहान नजरो का जिक्र आया तो

शरीफ लोग उठो दूर जाके बैठ गए

दुष्यंत कुमार

हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चहिये

दुष्यंत कुमार

एक आदत सी बन गई है तू

और आदत कभी जाती नहीं

दुष्यंत कुमार

अब तो इस तालाब का पानी बदल दो

ये कॅंवल के फूल कुम्हलाने लगे है

दुष्यंत कुमार

दोस्तों कैसा लगा आपको दुष्यंत कुमार के गजले और कविताये हमें कमेंट करके जरूर बातये। अगर अच्छा लगे तो अपने दोस्तों के साथ शेयर करना ना भूले धायनवाद।

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